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Prabhuji Maharaj ki Bhakto sahit (12) Jyotirling yatra

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Membership mission

000000विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक में आपका स्वागत है|मांस मदिरा का त्याग करके कोई भी व्यक्ति ११ रुपये वार्षिक या ११०० रुपये आजीवन सदस्यता शुल्क देकर  विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक का सदस्य बन सकता है |सदस्य बनने के लिए प्रात:१० बजे से साँय ४ बजे तक सम्पर्क करे, सम्पर्क सूत्र| — ०५८५३२६००६८

प्रभूजी आश्रम मेन गेट

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प्रभूजी महाराज के प्रवचन व भंडारा २०११

000000प्रभूजी महाराज के प्रवचन व भंडारा २०११ मुख्य अथिति अपर महाअधिवक्ता व अन्य भक्तगण

प्रभूजी महाराज के प्रवचन व भंडारा २००७

000000प्रभूजी महाराज के प्रवचन व भंडारा २००७ मुख्य अथिति न्यायमूर्ति एस०एन०श्रीवास्तव,अशोक घई,व अन्य भक्तगन॰

माँ काली जी के दर्शन व बाबा बैजनाथ भगवान से आशीर्वाद

000100विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक लखनऊ मण्डल अध्यक्ष कुंवर प्रवेश कुमार सिंह ‘गौर’ ने कई कार्यकर्ताओ सहित कोलकत्ता पहुचकर माँ काली जी के दर्शन किए, व बाबा बैजनाथ भगवान से आशीर्वाद प्राप्तकर गंगासागर मे 14-1-2014 को स्नान कर विश्व के चैनो-अमन के लिए प्रार्थना की|

प्रभूजी आश्रम भूमिपूजन २०१३ भाग -२

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प्रभूजी आश्रम भूमिपूजन २०१३ भाग -१

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Preachings of Prabhuji



संक्ष्प्ति जीवन परिचय

प्रभू जी का जन्म भगवान नृसिंह की पावन नगरी हरदोई के ग्राम मसफना में स्र्वगीय श्री छेदा सिहं जोकि इनके पिता श्रेष्ठ थे, के यहाँ 23 जनवरी 1962, दिन शनिवार को प्रातः 6 बजे हुआ था। इनकी साध्वी माता का नाम श्रीमती नरायण देवी था। जो भगवान शिव शंकर की परम भक्त थीं।

प्रभूजी ने कानपुर यूनिवर्सिटी से राजनीति में एम0 ए0 लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि की परीक्षा सन् 1991 में उत्तीर्ण की। इनका विवाह श्री भानू प्रताप सिहं, नि0 नबीपनाह, लखनऊ की पुत्री सुनीता सिहं से हुआ। इनसे दो पुत्र उत्पन हुए। जिनके नाम प्रवेश व विवेश सिहं है। आयु के 12 वें बर्ष में पिता की मृत्यु हो गयी थी। इनकी बहन व बड़े भाई भी है।

प्रभू जी का बचपन का नाम संत कुमार सिहं गौर है। प्रभूजी ने 1990 से 1994 तक एक स्वप्न देखा और उसी के आधार पर हरदोई जिले से पाँच भक्त सहित चित्रकूट पैदल यात्रा कर कामद्-गिरि पर्वत पर श्री गुरूदेव भगवान अश्वत्थामा जी महाराज के दर्शन एवं दीक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात अगली पद यात्रा किष्किन्धा तक करके अपने भक्तो सहित श्री हनुमन्त लालजी के दर्शन किये। अन्य कई तीर्थों की पद यात्रायें की। स्कन्ध पुराण के अनुसार प्रभू जी द्वारा अपने भक्तो सहित सम्पादित की गई।

गुरू की अनन्य कृपा से अन्याय का अन्त कर न्याय की स्थापना के लिये प्रभू जी सघंर्षरत है।

प्रभूजी चंदन हम पानी अंग-अंग समानी प्रभूजी दीपक हम बाती जाकी जोत बरै दिन राती प्रभूजी तुम मोती हम धागा जैसे सोने मिलत सुहागा।

प्रभू जी महराज

राष्ट्रीय अध्यक्ष

विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक

जीवन परिचय लेखक एवं प्रभू वाणी लिपिबद्धकर्ता प्रभू भक्त गण।
पुस्तक मिलने का पता प्रभूजी आश्रम हरदोई शाहाबाद (हाईवे)
सम्पर्क सूत्र = 09935882866/ 09793087983/ 05853260068
website:- www.prabhujimaharaj.com

अध्यात्मवाद

अ से अल्लाह, ध् से ध्यान, या से याद, त से तमो गुण रहित, मुझे माया रहित, व से वदी न करने वाला, द से दगा न करने वाला-अर्थात् अल्लाह अथवा सर्वोच्च सत्ता शिव का जो ध्यान लगाता है। निरन्तर याद करता हो तमोगुण रहित होकर, वदी न करने वाला व्यक्ति आध्यामिक कहलाता है।

अल्लाह

अर्थात प्रभु अर्थात शिव अर्थात अलिप्यु अर्थात सर्वोच्च सत्ता। अल्लाह से बड़ा कोई अधीश्वर नहीं है। अल्लाह सम्पूर्ण ब्रम्हाण्डों का स्वामी है। अल्लाह को वासना युक्त नेत्रो से देखना सम्भव नही है।

सम्पूर्ण वासनाओं का त्याग करके काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार को जीतकर ही अल्लाह को देखा जा सकता है। अल्लाह सच्ची राह दिखाता है। पैगम्वर पैगाम सुनाता है। अल्लाह यहाँ कभी भी जन्म नही लेता है।

प्रभू जी के दोहे

  • 1. राम नाम राजा भयो त्रेता युग माहि।
    राम नही वो राम चन्द्र, गयो महि समाय।।
  • 2. रोवत रोवत नारि के, नयना हो गये लाल।
    अपने को विष्णु कहे छोड़ी न कोउ डाल।।
  • 3. गुरू को मस्तक राखिय कबहूँ नही विसार।
    पुण्य-पुण्य रहि जात है। पाप गुुरू दे झार।।
  • 4. राम नाम की औसधि लेना ही है सार ।
    राम नही फिर का राह राम जगत का खेवन हार।।
  • 5. क्रोध नही तुम कीजिये क्रोध नरक की खान।
    बिना सोच होवे नही, लीजै प्रभु को जान।।
  • 6. पिता प्रभु से है बड़ा छोटा है प्रभु नाहि।
    पिता अभी जवान है, पुत्र मिल गया माहि।।
  • 7. काल चक्र है चल रहा, बचि है कोई नाहि।
    राम नाम की औषधि खाय वही रहि जाइ।।
  • 8. माता ही ब्रम्ह है माता जगत की सार।
    माता को दुख देना, बहुत होई बेकार।।
  • 9. एक दिन हमको मिल गये, यमपुरी के यमराज।
    जिन्दा को मुर्दा करैं मुर्दा करते राज ।।
  • 10. नारि जगत का सार है, नारि ही माया जाल।
    नारि बिना होवे नही, अच्छे-अच्छे लाल।।
11. शिव लोक में ब्रम्ह मिलो हाथ पैर थे नाहि। आँखे उनकी दस हती, सिर बीस दिखलाहि।। 12. मानुष ऐसा होएगा, जैसे वतिया ककरी केरि। ब्रम्ह खोजन को जायेगा, लौट न आवे फेरि।। 13. ठाढ़े पे माठो मिलो, पीने से प्रभु मिल जाय। ऐसो माठो पिवत खन, जीव नौलख जाय समाय।। 14. अच्छी काया देख के, भोग दियो लगाय। खाने में अच्छा लगे, अफरत ही मरि जाय।। 15. प्रेम नाम धागा नहीं कैसे तोड़ा चटकाय। जुड़ने को, को कहे तोरत ही जुडि़ जाय।। 16. राम हते सो मरि गये, राम रहे है नाहिं। ऐसा कहते दुष्ट जन, देही भूत समाय।। 17. जीव हतो जब गर्भ मा, रोवई औ मुस्काई।। चार भुजायें देखकर, हसता ही जाय।। 18. अंधा मानुष देख के आँखे देई लगाय। आँखे थी नहीं दीखता, फोरे सब दिख जाय।। 19. जिन्दा तो बोले नहीं मुरदा खूब अठिलाय। मुर्दा तो जिन्दा भायो, जिन्दा मुर्दा हुई जाय।। 20. एक बार काशी गयो शंकर मूली खाय। मूली सब कोई खात है, शंकर बनता नाय।। 21 पाथर में होते हरि, पाथर कूटन से मिल जाते। पाथर में ब्रम्ह है, मानुष कैसे जाने।। 22. मानुष बड़ा ही मूर्ख है, हरि-हरि चिल्लाय। हरि बैठे हैं बृह्म मा, मानुषई कैसे दिखलाय।। 23. जिनदा गाय के दूध नहिं, मरी देई दस पाव। जिन्दा तो बोले नहीं, मरी चिल्लावे आव।। 24. नारी के छूटत बिना, देही धूल समाय। नारी बांध के राखिये, देह कभी ना जाय।। 25. मानुष से कूकुर बड़ा मानुष छोटा नाहिं। बौराना कूकुर हता, ताहि देखि मनुज बौराहि।। 26. गुरू प्रभु से है बड़ा, पुभु गुरू से छोटा नाहि। गुरू का नाम सहज है, प्रभु का नाम लीजिए माहि।। 27. दाढ़ी मूँछ रखाई के, खोपड़ी लई मुड़ाई। डण्डा लेकर के चले, बैकुण्ठ दीखत नाई।। 28. हाथी जस माता रंगे, रेख तीन बनाई। ब्रह्मा, विष्णु जेब में, शंकर रोवत जाई।। 29. स्वामी लेकर दण्ड को, तूल वस्त लहराई। मांस मदिरा खाई के, स्वामी बैकुण्ठइ जाई।। 30. बाबा संग चेली फिरे, चोली खूब बनाय। बाबा मस्ती में चले, चोली हाथ लगाय।। 31. बाबा को दाई मिलीं, चश्मा बड़ा लगाई। चश्मा तो उतरे नहीं,ब्रह्म कहाँ दिखलाय।। 32. नख शिख बढ़ाना सहज है, मन रंगतै मरि जाय। बाबा ऐसे बावरे, सुन्दरी देख मुस्काय।। 33. मस्तक लगो चंदन बाबा के, शीतल भये हैं नाय। जातें में माया मिली, ता पे बार-2 इठलाय।। 34. रंगो सियार को देख कै, हुआ हुआ चिल्लाइ। रंगो सियार तौ बह्म है, दुनिया देखै नाइ।। 35. रंगा साधु देखकर, मानुष नरकई जाइ। साधु अगर रंगता नही, स्वर्ग कौन लइ जाई।। 36. मूड़ मुड़ाय हरि मिले, हमहू लेइ मुड़ाइ। माल पुआ को खाह के, रूके काम हैं नाइ।। 37. ंसतन अस करनी करी, जैसी काहू नाइ। भक्त शरण को जब चलो, राह से दियो भटकाय।। 38. एक ऐेसे स्वामी मिले, जिन पर बजरंगी आय। एक हजार मन भार है, फिर भी स्वामी रहे इठलाय।। 39. सुन्दर कन्या देखकर, बाबा भोग लगाय। कोई तो बापू बने, कोई बह्म कहलाय।। 40. ऐसे बाबा के नयन को, तुरतइ फोरा जाइ। फोरत नयन ही स्वर्ग मिले, बाबा नरकइ जाइ।। 41. स्त्री जहर की पुडि़या, खोली देखिअउ नाइ। अगर पुडि़या खोलिहौ, जीवित बचिहौ नाई।। 42. नारि अगर होती नही, कैसे होते राम। मानुष दुख की नागरी, राम देत विश्राम।। 43. माता का ऐसा प्रेम है,जैसा प्रभु का नाहि। माता माता कहत ही, प्रभु आपहि मिलि जाइ।। 44. शेर- शेरनी देखकर, बालक रहो मुस्काई। बालक अयो ब्रह्म से कैसे शेरनी खाइ।। 45. सूर्य में प्रकाश नहीं नखत चमकता जाइ। नक्षत्र जाको प्रबल है, सूरज सम होइ जाइ।। 46. सौ मंजिल का भवन है, सीढि़याँ नौ दिखलायें। सब सिढि़या टूटी भई, ब्रह्म तबहू चढि़ जाइ।। 47. जाइ रहे थे स्वर्ग को, पहुँचे नरक में जाइ। नरक तो आखिर नरक है, दीखत स्वर्ग है नाय।। 48. ईश्वर ही ये स्वर है, दूजो ब्रह्म है नाइ। नौ लख लोक ब्रह्म के, एकउ दीखत नाही।। 49. गुरू ब्रह्म से है बड़ा गुरू, ब्रह्म है नाइ। ब्रह्म को ढुढन चले, बिन गुरू मिलिहै नाइ।। 50. गुरू को मस्तक राखिये, चंदन चैक बनाय। चैरासी से जीव को गुरू, तुरतइ लेइ बचाय।। 51. ब्रह्म ने लिखा नही, पुत्र जाति का नाम। गुरू की महिमा जब भई पुत्र हो गये राम।। 52. सीता से शीतल भयो रावण लंका माहि। सीता तो थी नहीं रावण नरकई जाइ।। 53. हनुमान तो रूद है कैसे सिर पर आये। हाथ पटकते गुरू जी बजरंगी दिखलायें।। 54. सुलोचना के नयन देखि, कामिनी नारि डेराइ। पति मिलन तो भयो नहीं, पुत्र कहाँ से आय।। 55. राम नाम तो सत्य है, बाकी सब बेकार। खान पान को छोड़कर, प्रभु पर करो विचार।। 56. माँ काली की कृपा से तेज पुन्ज दिखलाय। माँ की कृपा हटत ही, गायब सो हुई जो जाय।। 57. अपना हदय श्मसान कर काली का भोग लगाओ। शमसान हवन कर मन वांछित फल पाओ।। 58. काली ही काल है, और न कोई काल। काली की भक्ति मिले छूटे माया जाल।। 59. छप्पन कोटी देवता, देवी गिनी न जाये। देवी देवता छोटे भये, भक्त बड़ो हुई जाय।। 60 भक्त न जाये यमपुरी, लेन न आवे दूत। श्रद्धा विना भक्ति नही होती है अवधूत।। 61. विश्वास करे श्रद्धा बड़े भक्ति शक्ति का सार। नश्वर यह संसार है, मोह करे बेकार।। 62. मोह कभी छूटे नहीं ठाढ़ो मानुष द्वार। मानुष तो रोतो भयो, प्रभु का कहे पुकार।। 63. चाकी बिच गेहूँ पिसे, आटा निकसता नाइ। मानुष तो प्यासो मरो, पानी सूखो जाई।। 64 पहाड़ पर जब चढि़ गयी, ऊँचो बहुत दिखाई। तीन लोक नौ खण्ड में , गुरू से ऊँचा नाई।। 65. बहती नदिया देखकर, नारी कहे पुकार। मानुष ने हत्या करी, उसकोे डालो मारि।। 66. गिरिजा मंदिर जाई के, दीपक देउ जलाय। हाथ कछु आवे नहिं गिरिजा घर को जाय। 67. राम और ब्रह्म में, अन्तर बड़ो समाय। बह्म देह में रहे, राम न ढ़ूढे़ जाय।। 68. सहस्त्र पंखुरी को कमल, जिसमें जलती ज्योति महान। ज्योति जब बुझ जात है, जीव होई शमसान।। 69. क्षणिक वैराग्य मिलत है, मुर्दा लखे निहार। जलते ही लाली भई, वैराग्य दियो बिसार।। 70. यह देही मिट्टी मिली, मिट्टी ही हुई जाय। पांच तत्व को पिंजरो, इन आखिन लखो न जाय।। 71. पानी में आगी लगी, पानी रहो फिनाय। मानुष देह शीतल नहीं, यह दुख झेलो न जाय।। 72. अगनित लोक ब्रह्माण्ड में, गिनती हुई पइहइ नाई। जितने रोवा छिद्र हैं, उतने ब्रह्माण्ड दिखाई।। 73. मांस मानुष जानवर, सबको एक समान। मांस जो नर खाइयहैं, बनि जावे शमसान।। 74. सुख ढूंढ़त मानुष फिरे, सुख तो मिलिहै नाहिं। शिव लोक दर्शन करें, सुख देखे चित माहि।। 75. कटा शीष था बोलता, ओइम शब्द के माहि। ब्रह्म लोक हिलने लगा, शंकर पहुँचे जाहि।। 76. झूठ कहें सांचो कहे, तब फिर लखपत होय। पुभु नाम लेते नहीं, फिर काहें रहें रोय।। 77. वैतारणी नदी विशाल है, प्राणी गोता खाय। अपने स्वार्थ के कारण, यमपुर पीटो जाये।। 78. रात हुई तो सोय गयो, दिन में जागां नाइ। जो दिन में जागतो- तो काहे को नरक जाइ।। 79. हरि तो मेरे पास है मंदिर मस्जिद नांहि। काहे राम रहीम को, बांग रहो लगाइ।। 80. कर्म का फल भोगे बिना, निकसे नही प्रान। ब्रह्म को पहिचानिये, और लिजिय जान।। 81. सब कुछ तेरे पास है, तुझको दीखे नाइ। नौ लख हीरे धरे भीतर , हैं तेरे घट माहि।। 82. अंदर तेरे बाग बगीचो, मधुर मुरलिया बाज रही। घण्टा और अनहद बाजे, प्राणी सुने कुछ भी नही।। 83. सोलह मानू को दरवाजो, बिजली जामे चमकि रही। छूते ही मरि जाओगे, देही मिलि जावे मही।। 84. काम नहीं कारज नहीं, नहीं प्रभू का नाम। सुरा सुन्दरी और पीता, निस दिन है तू जाम।। 85. अन्त समय आ गयो, लेने आये यमराज। कर्महीन प्राणी सदा, बिगरे सारे काज।। 86. स्वाद जीभ को चाहिये, पाप करे हजार। परहित और सेवा नहीं, नहीं करे उपकार।। 87. निज स्वार्थ के कारणे, चैरासी में जाय। कीड़ो-मकोड़ो बन फिरे, बड़ो छोटे को खाय।। 88. माया जोड़ी महल में, अन्त रहो पछिताय। कर्म बिना कुछ भी नहीं, माया साथ न जाय।।। 89. ये रथ और ये पालकी, सब कुछ है बेकार। सत्य प्रभू का नाम जगत में, और कुछ नहीं सार।। 90. माया की ये नागरी, सोनों रहो दिखाय। पावत नर पागल भयो, बिन पाय रहा न जाय।। 91. कामिनी की चपला चाल में, सूर वीर बिलाय। कामिनी तो पापिनी, तुझे जिन्दा डारे खाय। 92. एक महल ऐसो बनो, जामें सौ द्वारे दिखलाय। पास नर के जात ही , सारे जाई बिलाय। 93. मानुष और जानवर में, अन्तर कछु है नाहि। मानुष से जानवर भलो, जो स्वामी भक्त कहाइ।। 94. एक अचम्भो हमने देखो, पानी गयो बिलाय। आग बरत है कूप में, मछली रही इठलाय।। 95. राम कहो चाहे श्याम कहो, बैकुण्ड मिलिहै नाई। राम श्याम को छोड़कर, मन से प्राणी स्वर्गइ जाइ।। 96. राम बिना दीखे नहीं, पत्ता हिले न एक। राम नाम को छोड़ के, कबहुँ न मिलिहई टेक।। 97. समुद्र में गोता लगे, गिनती हुई हजार। खून पीप की नदिया में, उतराई रहे नर नार।। 98. रौरव नरक मंे जीव जब, प्रभु-प्रभु चिल्लाय। अन्धकार की गुफा वह, कछू नहीं दिखलाय।। 99. प्राणी स्वाद न लीजिऐ, स्वाद है विष की खान। स्वाद लिए मर जाओगे, निकसई तन से प्रान।। 100. सोने की नगरी अति पावन, जामे अप्सरा नाच रही। तपकरते है हिमालय पर, फिर भी मिल जाते मही।। 101. प्रेम किया था राम से, नही मिली आराम। ना तो मुरलीधर मिले, नहीं मिले है श्याम।। 102. सीता देह शीतल करे, उर्मिल से मिलन की आस। प्रभु रोते-रोते थके, नहीं पड़ो विश्वास।। 103. काला कौवा देखकर, मन कहीं लगता नाइ। शिव द्वारे से जायकर मन फिर पलटी खाइ।। 104. आधी रात में हरि मिले, जागत ही मरि जाय। प्राणी कभी सोवे नहीं, जागत ही रहि जाय।। 105. करूवी पाती नीम की, चाबे खूब मिठाय। मीठा फल है आम का खावत ही करूआय।। 106. नरक बैकुण्ठ सब ही यहीं, यहीं वसे है राम। माया की नगरी बनी, कबहुं न मिले विश्राम।। 107. सफेद गाय देखकर, मानुष लाल वर्ण हुई जाय। खूब इतराय और इठलाय, फिर मिट्टी में मिल जाय।। 108. नेवला सांप से कहेे, अपने गले लगाई। हम दोनो का मिलन है, बैकुण्ठ के मध्य माहि।। 109. भैंस का रंग लाल है, कबहुं नही बिलाय। चार दिन की चाँदनी, फिर मानुष नरकाई जाय।। 110. रोटी पानी छोड़कर, प्रभू से पे्रेम बढ़ाय। प्राणी बहुत खुश भयो, देखि किरण उर माहि।। 111. मन माया को पींजरो, बाजीगरी देखाय। कबहुँ लई जाय स्वर्ग को, कबहुँ नर्क लइ जाय। 112. शिव-शिव क्यों कहें, कबहुँ न कहिए राम। स्वर्ण देह कन्या बनी, छुवत मिले बिसराम।। 113. माता पे्रम की खानि है, प्रेम दियो सिखलाय। पोथी में पण्डित नहीं, पे्रम करे बन जाय।। 114. रोवत-रोवत थक गयो, गुफा दिखानी नाई। वर्ष अठारह गुफा में, शेष बीच रहि जाई।। 115. बड़ा समुन्दर देखकर, प्राणी सफेद वर्ण हो जाय। पैठत ही गायब भयो, समुद्र दीखतो नाइ।। 116. गूलर के फूल को , मानुष पांव शंख बजाय। फूल गूलर हो तो नहीं, फिर कैसे मिल जाइ।। 117. अंधा पत्री पढि़ रहो, नैनन वालो नाई। अंधे को सब कुछ दिखे, नैन दुखी दिखलाय।। 118. बूढा़ कहे जवान से, काहे रहयो इतराई। तुमहू हमसे होओगे, कछुक दिवस ही माहि।। 119. झूठा जगत ये जानिये, झूठा ये संसार। जिस मकान को खोजते, वो मकान भयो झार।। 120. कुम्हार मिट्टी देखकर, खूब रहो इठलाइ। मिट्टी हंस कुम्हार पर, तू भी माटी में मिल जाय।। 121. कुत्ता पालना ठीक है, पुलिस पालना नाहिं। पुलिस से कुत्ता भला स्वामी भक्त कहाहि।। 122. मुर्दा मीठो शहद से, शहद खाइये नाहि। मुर्दा एक बार जो खाइये, मिठास कबहुँ न जाय।। 123. प्रेम कीजिए राम संग, और सभी बेकार। परम ज्योति वो पुन्ज है, जिन्दा नहीं साकार।। 124. पेड़ बबूल कांटे नहीं, कांटे आम में दिखलायें। बबूल खात मीठो लगे, आम रहयो करूआय।। 125. यौवन के आनन्द को, कहते परमानन्द। सुरा सुन्दरी यदि, मिले, जीव होई सानन्द।। 126. लकड़ी के बिन पेड, कैसे खड़ो दिखाइ।। फल-फूल आवे नहीं, मेवा मानुष खाय।। 127. मिट्टी का यह चैखटा, सोने का है नाहि। इतर गुलाब लगाय के, क्या सोने को बन जाय।। 128. गठरी ये मल मूत्र की, फिर काहे इतराइ। गंगा में स्नान से, मल मूत्र कहां बिलाइ।। 129. बूढ़ा सिर बिन बोलता, बोले नहि सिर से जवान। प्रभू मुख से ना निकले, निकले तो घट जाये शान।। 130. पत्नी को अम्मा कहंे, पत्नी बोले नाई। गर अम्मा होती, नहीं पत्नी कैसे मिल जाय।। 131. नारि मृत्यु का द्वार है, रौ-रौ नरक की खान। नारी अगर छुटिहये, हृदय रहे न प्रान।। 132. मानुष मास न खाइये, नहीं पीजिए शराब। मास पशु नहीं खात है, कुकुर नही पिये शराब।। 133. पुलिस का मांस बसात है, बदबू बहुत ही आय। जो पुलिस के पास बैठता, निश्चय नरकई जाय।। 134. नारी के छुओं पैर तुम, लीजौ कण्ठ लगाई। माता की सेवा बिन, मानुष नरकै जाइ।। 135. है उजाला नरक में, स्वर्ग में दिखे नाय। नरक जान में स्वाद है, स्वर्ग पहुंचिहो नाय।। 136. नेता को देखे नहीं, देखे तीनो लोक नसाय। जिस कोख जन्म लिये, वह कोख बांझ हो जाय।। 137. नेता से डकैत भलो, मार पीट के खाय। नेता उतारे चमड़ी, जेल दूसरो जाय।। 138. मात-पिता के पाप से, नेेता जन्मे आय। पिता होते खन मरे, माता डारइ खाय।। 139. प्रजा-तन्त्र ये राज है, जिसमें मांस बिकाय। माँस खाय नेता को लाड़लो, दूजो पीटो जाय।। 140. कंचन काया देखकर, मन ही मन मुसकाय। काया छुअत मैली भई, छुये बिन रहा न जाय।। 141. ऊँचों महल बनाय के, कुर्सी लई लगवाय। कुर्सी ऊपर जीव है, ब्रह्म कहाँ को जाय।। 142. प्रभू की माया में फंसो, अन्धों दीखे नाय। प्रभु से जो विनती करे, माया तुरत नसाय।। 143. माया के बीच जीव है, जीव बीच माया नाहिं। वस्त्र बिना नंगे भये, वस्त्र मिलेगो माहि।। 144. मंदिर में न राम है, मस्जिद नहीं खुदाय। मानुष तू बहिरो भयो, काहे राम-खुदा चिल्लाय।। 145. पुलिस को जो कोई छुए, तुरतई करे गंगस्नान। पुलिस तो स्वान है मानुष भी बन जाते स्वान।। 146. वेद पढ़े पंण्डित बनें, सारा जग होई जाय। लिखने बाला ब्रह्म हो, पढ़नें वाला शिवाय।। 147. आगि से पानी जरा, पानी से आगि नाय। बेटा से बाप भयो, बाप से बेटा नाय।। 148. गंगा मंे कछुवा रहे, ब्रह्म दीखता नाय। नित नहाय कछुआ थको, बैकुण्ठ गयो है नाय। 149. मछली के मुख राम हैं, मछली लीजै खाय। राम तुम्हें मिल जायेंगें, रो-रो नरके माय।। 150. बिन पग चलता जात है, लाख कोस चल जाय।। पग-वाला कढि़लत चलें, दुई कोस पहुँचत नाय।। 151. काल कोठरी में पड़ो, फिर भी रहो मुसकाय। बाहर आये रोयकर, भूख-भूख चिल्लाय।। 152. आँखिन से अंधा भयो, बिन आँख सब दिखलाय। चुनरी में जब दाग है, ब्रह्म मिले सो नाय।। 153. नौ द्वारे सबके खुले, मानुष पशू समान। द्वार बन्द है दासवां, उसका कीजै ज्ञान।। 154. भृकुटी के बीचो बीच, जलती ज्योति मसान। उसे कहे हैं आत्मा, जिससे होवे आत्मज्ञान।। 155. उसके नीचे सुनो निरंजन, अपनी अलख जगाते हैं। आज प्रभू जी सबको, दसवें द्वारा का भेद बताते हैं।। 156. नास्तिक भेद नहीं जान पायेंगें। आस्तिक उसमें हीं फंस जायेगें।। 157. तेज पुन्ज प्रकाश से निरंजन, हैं बहु दूर। भेद ये प्रभु भक्त ही जान पायेंगें।। 158. प्राण वायुक को अपान से, ले जाओ ब्रह्माण्ड। जिसमें नौलख सूर्य हैं, कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड।। 159. जिसमें बजता सुनो सितारा, जिसमें नौ लख का है अखाड़ा। सम्पूर्ण वासना त्यागकर, माया जाल को जिसने जड़ से उखाड़ा।। 160. खुले दासवां द्वारा जब , छूटे सब संसार। भवन स्त्री रहे ना,। मन होवे लाचार।। 161. द्वारा दासवां खुलत ही, पांच अश्व मरि जाय। मन के पांचो पैर है, फिर मन चलि पावे नाय।। 162. प्राणी परमानन्द में, गोता रहयो लगाय। सारा जग झूठा लगे, मुर्दा भी जी जाय।। 163. ब्रह्म ग्यारहवें द्वार बीच, और कछू है नाहिं। द्वार ग्यारहवें के खुलते, जीव ब्रह्म हुई जाय।। 164. सौ योजन की नदी है, सहस्त्र केर पहाड़। नदी पहाड़ को पार कर, जीव लगावे दहाड़।। 165. लगाते ही दहाड़ प्राणी मरे, ब्रह्म-ब्रह्म रहि जाय। ग्यारहवें द्वार का यह रहस्य है, प्रभु ने दियो बताय।। 166. बारहवें द्वार बीच रूद्र है, शंकर योगी महान। शंकर के भेद को, जाने जगत जहान।। 167. रूद्र कोप का नेत्र तीसरा, जब खुल जाता है। भेद बारहवें द्वार का प्राणी पा जाता है।। 168. बारहवें द्वार में 108 बगीचे जिनको प्राणी नहीं सीचें। बिन पानी वे हरे रहत हैं, जो उन्हे देखे अपनी आंखे मीचे।। 169. बारहवें द्वार में गुफा विशाल जिसमें होत नहीं प्रकाश। अंधकार वहाँ है नहीं सूर्य प्रभू का एकइ खास।। 170. बारहवें द्वार मंे झरनें वहे सोलह हजार। जिन झरने में पानी नहीं रूप रूपी वह संसार।। 171. रूद्र भक्त वहाँ जाते हैं भेद वही सब पाते हैं। और कोइ्र ना जा पाये, बारहवें द्वार का भेद प्रभू बतलाते हैं।। 172. तेरहवें द्वार में लगता है, विष्णु का दरबार। विष्णु लोक वक कहलाता, उसे विष्णु भक्त देखों साकार।। 173. सौ योजन का समुद्र है, जिसमें बहे दूध की धार। शेषनाग शैया पड़ी, इस पर लेटे जगत के पालन हार।। 174. शेषनाग जब डोलत है, पृथ्वी पर आ जाता भूचाल। प्रभू का माया रूपी जाल है, जिसकी सुनो अनोखी चाल।। 175. तेरहवाँ द्वार तेरह घड़ी, तेरह योजन है विस्तार। केदार नाथ आगे चलो, है वेतरणी के उस पार।। 176. कनकपुरी फिरि मिलि जावे, जिसमे सोने के भवन शोभा पाते हैं। शरीर के अन्दर तेरहवां द्वार है, जिसका रहस्य आज प्रभू बतलाते हैं।। 177. चैदहवाँ द्वार चैदह भुवन सतकोटि है विस्तार। समर्थ गुरू के बिना, इस द्वार का कैसे पाते पार।। 178. चैदह भुवन के मध्य में नदी बहे विशाल। छुवत ही सोना भये, देह जाय हुई लाल।। 179. चैदहवां द्वार जब खुलत है, आंखें होती चार। ज्योति प्रबल तब होती है, मन होवे लाचार।। 180. तेज पुन्ज को देखकर, जीव रहो मुस्काइ। जीव तो जीव है, ब्रह्म वहाँ दर्शाइ।। 181. चैदहवें द्वार में ब्रह्म अनेक, जिनसे पार न पाया जाय। पृथ्वी कोटि ब्रह्माण्ड कोटि, सूर्य कोटि दिखलाय।। 182. चैदहवें भुवन में, प्रकाश ही प्रकाश है और कछु है नाई। चैदहवें द्वार का राज भक्तों, प्रभु ने दिया बताय।। 183. पन्द्रहवां द्वार महान है, जिसमें जाते ही, जीव भस्म हो जाय। जीव वहाँ जाता नहीें, सहस्त्र हजार विष्णु रहे मुस्काइ।। 184. पंद्रहवें द्वार के मध्य में, लगता सहस्त्र विष्णु दरबार।। सहस्त्र करोड़ पृथ्वी तनी सहज करोड़ सूर्य संसार। 185. पन्द्रहवें द्वार में पेंड़ अनेक, जिनकी गिनती लगती नाई। गिनती लगावन माली गयो, फिर वापस लौटो नाय।। 186. पन्द्रहवें द्वार मंे सहस्त्र रंग, प्रकाश है अंधकार है नाई। प्रभु भक्तों जब मुक्ति मिले, जइयों पंद्रहवें द्वार माहि।। 187. सोलहवाँ द्वार महान है, सोलह कला अवतार। मानुष वहाँ जाता नहीं, प्रभू रूपी है वह संसार।। 188. द्वार सोलहवें का अद्भुत खेल, प्राणी उसे पाये नहीं देख। जिन्दा ही मरि जाता हैं, ऐसा सोलहवें द्वार का लेख।। 189. कोटि स्वर्ण गिरि द्वार सोलहवें, और सोने की खान। बखान सोलहवें द्वार का प्रभु करें, भक्तों लीजिए जान।। 190. द्वार सत्रहवें काहै, सहस्त्र योजन विस्तार। हिमालय के उस पार हैं, नहीं है इस पार।। 191. पक्के मन की बर्फ शिलायें गिरती जहाँ बारम्बार। तापकृम है शून्य जहाँ पर, मरा हुआ है जहाँ संसार।। 192. सत्रहवें द्वार में, सत्रह हजार सूरज रहे दिखलाई। जिनकी गर्मी से, चहुँ दिस अग्नि फैली जाय।। 193. यह तो ऐसी आग है, जल से बुझती नाय। जल धारा ऊपर बहे, आग तुरत बन जाय।। 194. अग्नी उसमें प्रचण्ड है, जीव जन्तु है नाय। प्रभु भक्तों सुन लीजिए रहस्य प्रभू बतलाय।। 195. द्वार अठारहवाँ एक गुफा, अन्धकार जिसमें है नाय। फूलों के हैं लगे बगीचे, माली नहीं रहयो दिखलाय।। 196. फूल हजारांे रंग के, खुशबू उनमें अपार। उस सुगन्ध को सूंघते, बचे नहीं संसार।। 197. द्वार अठारहवें की सुगन्ध, सहस्त्र भुवन लौ जाय। जिन्दा को मुर्दा करें, मुर्दा जिन्दा हुई जाय।। 198. जिन्दा वहाँ बोले नहीं, मुर्दा खूब बतलाय। अठारहवें द्वार के मध्य में, प्रभु दर्शन हुई जाय।। 199. द्वार अठारहवें के रहस्य को, कोई जानत नाय। सुन भक्तों अब लीजिये, प्रभु आज रहे बतलाय।। 200. द्वार उन्नीसवें लगो अखाड़ा, रूद्ध ने जिसमें रूद्धको पछाड़ा। अनेेक रूद्ध हैं वहाँ, लगता जिनका हर वर्ष अखाडा।। 201. तीन नेत्र हैं रूद्र में और किसी के नाय रूद्र को भंजन करे, जगत भस्म इुई जाय। 202. नदियां वहा अनेक हैं झरने है नौ लाख। मानुष वहाँ पहुँ नहीं पहुँत होवे खान। 203. द्वार उन्नीसवें में जो कुछ है, उसका ओर न छोर। भक्तों सुनिये हाथ गुरू के, द्वार उन्नीसवें की डोर।। 204. पूर्ण रहस्य उन्नीवें द्वार का भक्तों लीजै जान। प्रभु शरीर मसान है, प्रभु ने दीन्हों ज्ञान।।

।। समाप्त।।

विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक

प्रस्तावना

आज चारो ओर हाहाकार मचा हुआ है। न्याय पाने के लिए मानव व्याकुल हैं। शासन तंत्र असफल सिद्ध हो रहा है। अधिकारी वर्ग मनमानी कर रहे हैं। किसानों को अपनी फसलों की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है।

किसानों की जमीन कर्ज में कम रूपयों में नीलाम करायी जाती है। अन्याय का अन्त कर पुनः न्याय की स्थापना करने हेतु विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक अग्रसर है। विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक का सदस्यता अभियान चल रहा है।

प्रत्येक युवा लड़के-लड़कियाँ विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक के सदस्य बनकर युग परिवर्तन में सहयोग प्रदान करें।

विश्व मानव संगठन अध्यात्मिक के कार्य-

1. मांस मदिरा की बिक्री सम्पूर्ण भारत में बन्द करवाने का कार्य करवाना।
2. सदस्य लोकसभा, विधानसभा, विधान परिषद, राज्यसभा के किसी भी सदस्य को वेतन भत्ता पंेशन न दी जाये। इसकी व्यवस्था करवाना।
3. किसानों का सम्पूर्ण कृषि कर्ज मय ब्याज माफ करवाना।
4. किसानों को कृषि कार्य के लिए बिजली एवं पानी निःशुल्क दिया जाये, इसकी व्यवस्था करवाना।
5. स्नातक, परास्नातक को नौकरी न मिलने पर 2000 रू0 मासिक बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था करवाना।
6. किसानों को कृषि कार्य के लिए ब्याज रहित कर्ज की व्यवस्था करवाना।
7. कृषि कर्ज में तहसील हवालात में 14 दिन का कारावास मानवाधिकार के विपरीत है। इसको समाप्त करवाने की व्यवस्था करवाना।
8. माँ काली के मन्दिरों में मांस मदिरा न चढ़ाई जाये। इसकी व्यवस्था करवाना।
9. सम्पूर्ण जातिगत संगठन समाप्त करवाने का कार्य करवाना।
10. जातिगत आरक्षण पूर्णरूप से समाप्त करवाकर आर्थिक रूप से लागू करवाना।
11. किसान अपने अनाज की कीमत स्वयं निश्चित करें। इसकी व्यवस्था करवाना।
12. अधिवक्ताओं के लिए अधिवक्ता कालोनियों का निर्माण करवाना।
13. विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक के प्रत्येक सदस्य के बच्चों के लिए निःशुल्क चिकित्सा एवं शिक्षा की व्यवस्था प्रत्येक ब्लाक स्तर पर करवाना।

नोट

विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक का प्रत्येक कार्यकर्ता पदाधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने को तैयार रहेगा। धरना, भूंख-हड़ताल एवं प्रदर्शन करेगा और प्रत्येक कार्यक्रम में भाग लेगा।

प्रभू जी की वाणी

संसार परमात्मा की कल्पना से निर्मित है। मनुष्य एक शक्ति का ऐसा पुन्ज है जिसमें परमात्मा की सम्पूर्ण शक्तियां समायी हुई हैं। शरीर में रहते हुए जो आत्मा को पहचान ले और उसी में लीन हो जाये वही भगवान है। योग और साधना का अर्थ पकड़ना है। आत्मा क्या है? परमात्मा क्या है? आत्मा एक प्रकाश है। परमात्मा भी एक प्रकाश है न आत्मा का जन्म होता है। आत्मा भोजन नहीं करती परमात्मा भी भोजन नहीं करता न आत्मा गर्भ धारण करती है, आत्मा भी अमर है और परमात्मा भी अमर है फिर भी आत्मा और परमात्मा में भेद क्या है? आत्मा एक छोटा प्रकाश है और परमात्मा में भेद क्या है। आत्मा एक छोटा प्रकाश है और परमात्मा प्रकाश पुन्ज है। समस्त आत्माओं के एकीकृत बिन्दु को परमात्मा कहते हैं। जीव और आत्मा में क्या अन्तर है? जीव कर्म करता है, जीव पाप पुण्य का फल भोगता है जीव प्रेत योनियों में जाता है, जीव यमपुरी को जाता है। जीव का शरीर से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसलिए जीव अन्त में शरीर नहीं छोड़ना चाहता। लेकिन परमात्मा पर कोई नियम लागू नहीं होता है। आत्मा का सम्बन्ध मात्र परमात्मा से है अन्य किसी से नहीं। अयोध्या के राजा रामचन्द्र और द्वारिकाधीश महाराज श्रीकृष्ण और सामान्य व्यक्ति में अन्तर क्या है? अन्तर मात्र कर्मों का है। सतयुग में जन्में मनुष्यों के शरीर का निर्माण तो पांचों तत्वों से ही हुआ है। फिर भेद क्या है? मात्र कर्माें का है।

रामचन्द्र और श्रीकृष्ण के शरीर में उतने ही अंग थे जितने एक साधारण मनुष्य के शरीर में फिर भेद क्या है? कोई साधारण मनुष्य भी भगवान बन सकता है। भगवान किसे कहते हैं। जो मनुष्यों मेे तेज धारण किये है। सदैव सत्य बोलने वाला जो कहेगा। वह सत्य ही होगा। आत्मा का परमात्मा से मिलन शरीर नष्ट होने के बाद ही हो सकता है। हाँ अगर शरीर में रहते हुए आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से चाहते हो तो शरीर मे स्थित जीव को मृत्यु तुल्य कष्ट देना होगा। योगी बनने के लिए तीन बाते आवश्यक हैं।

(1) स्वयं को मृत समझो। (2) अन्य में स्थित स्वाद को छोड़ दो। (3) वासना से तटस्थ रहकार ब्रह्मचर्य का पालन करो, क्या ब्रह्मा, विष्णु और शंकर परमात्मा हैं, नहीं। क्यांेकि इनकी तस्वीरें भी परमात्मा नाशवान नहीं हैं। वह अनन्त है अविनाशी है। परमात्मा शिव है जो मनुष्य के शरीर से बोलता है, जब शरीर शिव विहीन हो जाता है तो शरीर शव हो जाता है। सत्य क्या है? सत्यं शिवम् सुन्दरम् सत्य ही शिव है। और शिव ही सुन्दर है अर्थात आत्मा ही सत्य है। आत्मा ही सुन्दर है क्या आत्मा परमात्मा बन सकता है। जैसा कि पूर्व में विदित है प्रकाश पुन्ज में विलीन होने के बाद स्वयं प्रकाश नहीं करता हैं, वह तो प्रकाश पुन्ज बन जाता है। जो कि परमात्मा है। अथवा जैसे वर्षा का जल सागर मे समाहित हो जाता है तो बूंदो का अस्तित्व नहीं रहता है। अथवा जैसे कम पावर की बिजली में अर्थिंग लगाने से पावर बढ़ जाता है उसी प्रकार जब आत्मा के परमात्मा का अर्थिंग लग जाता है तो वह पूर्ण प्रकाश अथवा परमात्मा बन जाता है। प्रभू जी के तीन जन्म की कहानी। गणेश जब याद हमें दुर्गागंज की आती है। चाँदी की पाती मुझे बंुलाती है। प्यारे वानर हमंे पुकारे, कण-कण से आवाज यही आती है। घास और मिट्टी भी कुछ कहती है। छोटे-छोटे बच्चे ऐसे दौड़ रहे हैं। जैसे गाये बछडों को दूध पिलाती है। गणेश जब याद हमें दुर्गागंज की आती है। आँखों से अश्रुधार बहती है। वानरों की टोली क्या कहती है? पूर्व जन्म में लगी समाधी वानर हमें बचाते थे। गणपति द्वारे खडे़ अश्रु धार बहाते थे। बीत गये षटमास , वानर यहीं बताते थे। पूर्व जन्म के वानर मानुष बन दुर्गागंज तनुधारी है। प्रभू भक्ति में मस्त हुए जैसे वृतधारी हैं। कन्यायें ऐसे झाँक रही थी उनकी शोभा न्यारी थी। पूर्व जन्म का रिश्ता कैसे छूटे ये मेरी लाचारी थी। बहुएं घूँघट पटधारी माताएं उन्हें बताती थीं। वृद्धाओं की टोली दौड़ी अश्रु धार बहाती थी। उमेश गले में लिपट गया पूर्व जन्म में झाडू यही लगाता था। छुन्नू बेल पाती लाकर-हमको नित्य खिलाता था। एक शिष्या मेरी माधुरी थी। सुन्दर अधिक चातुरी थी। नाम शारदा पड़ा उसका शादी भी हुई हमारी थी। लेकिन पत्नी का दर्जा नहीं मिला ये उसकी लाचारी थी। मोक्ष की डोरी, जब खत्म हुई हम दोनों ने यहाँ जन्म लिया। पत्नी का दर्जा उसे मिला पति उसने मुझको स्वीकार किया। समय चक्र

Today’s Quote

विश्व मानव संगठन आध्यात्मिक के सभी सदस्यो एवं पदाधिकारियो को  सूचित किया जाता है ,कि दिनांक I-7-2016 को समय 12 बजे  प्रभूजी महाराज के नेतृत्व मे 10 सूत्री मांगो को लेकर एकदिवसीय धरना-प्रदर्शन हजरतगंज गांधी जी की प्रतिमा के नीचे किया जायेगा आप सभी का उपस्थित होना अनिवार्य है|प्रभूजी महाराज

Note

प्रभूजी आश्रम पर जड़ी-बूटियों से निशुल्क चिकित्सा एवं ज्योतिष से पूर्ण जन्म-पत्रिका, कुड़ली-मिलान, मांगलिक दोष से बचने के उपाय, भूत-प्रेत से परेशान ,  असाध्य रोगी,  निसंतान दंपत्तियो व मानव  की सम्पूर्ण समस्याओ का निराकरण किया जाता है |